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सभी बड़े अधिकारी थे मौजूद, फिर भी फेल हो गया बीजापुर नक्सल ऑपरेशन, जानें क्या रहे प्रमुख कारण ?

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में 22 जवान शहीद हो गए, जबकि 31 जवान घायल हैं। जिनका इलाज चल रहा है। जिसके बाद पूरे देश में नक्सलियों के प्रति आक्रोश है।
  • Bhupendra Singh Chauhan

  • Published:04-04-2021 15:23:00
  • राज्य

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में 22 जवान शहीद हो गए, जबकि 31 जवान घायल हैं। जिनका इलाज चल रहा है। जिसके बाद पूरे देश में नक्सलियों के प्रति आक्रोश है। घटना पर पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शहीद जवानों के प्रति गहरा शोक व्यक्त किया है।  



लेकिन इन सबके इतर यदि हम नजर डालें कि, आखिर इतना बड़ा हमला और नक्सलियों के होने की सूचना के बावजूद इतने जवानों का शहीद हो जाना कहीं न कहीं ऑपरेशनल प्लानिंग की नाकामी की तरफ इशारा कर रही है। मौके पर पहुंचे 700 सुरक्षाबलों को घेरकर नक्सलियों के करीब 3 घंटे गोलियां चलाईं। करीब 24 घंटे बाद जवानों के शव लेने रेस्क्यू टीम पहुंची।



जानकारी के अनुसार, करीब 20 दिन पहले ही सुरक्षाबलों को यह सूचना मिली थी कि, वहां पर बड़ी संख्या में नक्सली एकत्र हैं। जहां मुठभेड़ हुई, वह क्षेत्र नक्सलियों की फर्स्ट बटालियन का क्षेत्र बताया जा रहा है। 20 दिन पहले UAV की तस्वीरों के जरिए पता चला था कि यहां बड़ी संख्या में नक्सली मौजूद हैं। फिर भी आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई, जिसमें हमने 22 जवानों को खो दिया ? 



आइये नजर डालते हैं कुछ प्रमुख बातों पर जो इस ऑपरेशन के फेल होने के कारणों की तरफ इशारा कर रही हैं -- 



CRPF के ADDP ऑपरेशंस जुल्फिकार हंसमुख, केंद्र के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार व CRPF के पूर्व DGP के.विजय कुमार और वर्तमान IG ऑपरेशंस पिछले 20 दिनों से जगदलपुर, रायपुर व बीजापुर के क्षेत्रों खुद मौजूद हैं। नक्सल ऑपरेशंस से जुड़े सूत्रों की मानें तो इस तरह एक ही क्षेत्र में तीन-तीन बड़े अधिकारियों की मौजूदगी नक्सलियों को भी अलर्ट कर देती है। उन्हें बड़े अधिकारियों के लगातार मूवमेंट की भनक लग जाती है, जिसके अनुसार वो अपनी प्लानिंग करते हैं। बीजापुर नक्सली हमले में भी यही हुआ।



ऊपर से बनी इन रणनीतियों पर ग्राउंड में मौजूद अधिकारी अपने क्षेत्र की टोपोग्राफी और डिमांड के हिसाब से ऑपरेशन प्लान करते हैं। लेकिन, यदि लंबे समय तक रणनीति में बदलाव न हो तो सुरक्षाबलों बलों की मुश्किल और बढ़ती जाती है। ऐसे में नक्सलियों को अपने ऊपर होने वाले हमलों को गेज करना आसान हो जाता है और जवानों की जान जोखिम में पड़ जाती है।




बीजापुर के इस नक्सली हमले से पहले अन आर्म्ड व्हिकल या ड्रोन से मिली फोटो और वीडियो के आधार पर यहां ऑपरेशन प्लान किया गया। नक्सल ऑपरेशन के सूत्र बताते हैं कि, 100-200 नक्सलियों का मूवमेंट दिखना आम बात है। इसे आप किसी ऑपरेशन को प्लान करने का इंटेलिजेंस इनपुट नहीं मान सकते।








लोकल लेवल पर नक्सली गुटों के साथ शामिल लोग सुरक्षाबलों के लिए किसी भी हथियार से बड़ा सहारा होते हैं। उन्हीं से मिली जानकारी के आधार पर, पिन पॉइंट ऑपरेशंस प्लान होते हैं। लेकिन, पिछले कुछ सालों से नक्सल ऑपरेशन में शामिल अधिकारी वाहवाही लूटने के लिए सरेंडर करवाने पर जोर देने लगे हैं। 




सरेंडर करने के बाद किसी नक्सली या मुखबिर से मिली जानकारी छह महीने से अधिक काम की नहीं होती। ऐसे में सुरक्षाबलों को अंदर से आने वाली सूचनाएं मिलना कम हो गईं हैं।पांच तरह के अलग-अलग फोर्सेस की ऐसे ऑपरेशन में मौजूदगी कमांड व कंट्रोल के लिए बड़ी चुनौती है। 




फायरिंग की सूरत में सभी अपने-अपने प्रशिक्षण व बनावट के हिसाब से कार्रवाई करते हैं। यूनिफॉर्मिटी नहीं रह पाती, लेकिन दूसरी ओर नक्सलियों की ट्रेनिंग और कमांड हमेशा एक ही रहता है। उनकी यूनिट कोई भी हो, लेकिन एक्शन के समय उनकी यूनिफॉर्मिटी कभी खराब नहीं होती।




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