क्या पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड की राजनीति में व्याप्त इस काली परंपरा को तोड़ पाएंगे ? या फिर...

उत्तराखंड में पिछले कई महीनों से जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक बार फिर मुख्यमंत्री चेहरा बदल दिया गया है। महज चार महीनों के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को बदलकर अब भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री बनाया है।
     
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उत्तराखंड में पिछले कई महीनों से जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक बार फिर मुख्यमंत्री चेहरा बदल दिया गया है। महज चार महीनों के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को बदलकर अब भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री बनाया है। बता दें अगले वर्ष उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा इसे नए चहेरे के नाम पर भुनाना चाह रही है। 


गौरतलब है कि, वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था और इस दौरान 11 मुख्यमंत्री बन चुके हैं। यानी कि महज 21 वर्षों में 11 मुख्यमंत्री बनने से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि, उत्तराखंड की राजनीति कितनी अस्थिर है। यदि एक बार इसके इतिहास में नजर डालें तो अगले वर्ष होने वाले चुनाव पर भाजपा को खासा लाभ मिलने की आशा नहीं दिख रही है।  


दरअसल, अभी तक राज्य में अंतरिम सरकार से जब भी मुख्यमंत्री बदला गया, तो सत्ता भी बदली है। 9 नवंबर 2000 को नित्यानंद स्वामी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। स्वामी अपना कार्यकाल पूरा कर पाते कि, एक वर्ष पूरा होने से पहले ही यानी सिर्फ 354 दिन में ही नित्यानंद स्वामी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर सरकार की कमान भगत सिंह कोश्यारी को सौंप दी। 


कोश्यारी का कार्यकाल भी कुछ ठीक नहीं रहा और सिर्फ 123 दिन तक सत्ता संभालने के बाद चुनाव में उतरे कोश्यारी पार्टी को जीत नहीं दिला सके। भाजपा चुनाव में हार गई और कांग्रेस के सिर ताज सजा। इसके बाद अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हारी और भाजपा ने सत्ता में वापसी की। बीसी खंडूरी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। मगर खंडूरी के खिलाफ पार्टी में विरोध के सुर उठने लगे। 


विरोधों के बीच 839 दिन का कार्यकाल पूरा करने के बाद खंडूरी को भी पद से हटा दिया गया। उनकी जगह रमेश पोखरियाल निशंक को राज्य की कमान सौंपी गई। निशंक के विवादों में घिरने के बाद भाजपा ने फिर खंडूरी को सीएम बनाया। लेकिन भाजपा का यह चेहरा भी काम नहीं आया और भाजपा फिर चुनाव हार गई। 


वर्ष 2012 में तीसरा विधानसभा चुनाव हुआ और कांग्रेस सत्ता में लौटी। राज्य की बागडोर विजय बहुगुणा को सौंपी गई। बहुगुणा 690 दिन तक सीएम रहे। उनके कार्यकाल में ही वर्ष 2013 में आपदा आई, जिसमें हजारों लोगों की जान गई और सैंकड़ों लोग लापता हो गए। कांग्रेस को लगा कि विजय बहुगुणा से लोग नाराज होंगे और उनके नेतृत्व में चुनाव में गए तो फायदा कम नुकसान ज्यादा होगा। 


जिसके चलते कांग्रेस ने बहुगुणा को हटाकर हरीश रावत को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया गया, लेकिन रावत कांग्रेस को जीत नहीं दिला सके और वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई। हरीश रावत खुद दो विधानसभा सीट से मैदान में उतरे थे, मगर दोनों जगह से वह चुनाव हार गए। कांग्रेस के 11 विधायक ही विधानसभा तक पहुंच सके।


चौथे विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुमत के साथ सत्ता में आई और पार्टी ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन 1453 दिन के कार्यकाल के बाद ही उन्हें कुर्सी से हटा दिया गया और बीते मार्च में तीरथ सिंह रावत को कमान दी गई। लेकिन तीरथ सिंह रावत सिर्फ चार महीने में सत्ता से बेदखल कर दिए गए। अब जबकि पुष्कर सिंह धामी को कमान सौंपी गई है। 


यानी कि, भाजपा ने लगभग हर चुनाव से पहले चेहरा बदला और हार का सामना करना पड़ा। तो इस बार यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि क्या इस बार पुष्कर सिंह धामी को चेहरा बनाकर सत्ता गंवाने की परंपरा तोड़ पाते हैं या नहीं। बता दें उत्तराखंड में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। 


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