यूपी की राजनीति पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी का ब्लॉग यूपीनामा- राम-परशुराम और ओबीसी आरक्षण की हवा !

तीन दशकों से मंडल बनाम कमंडल की जंग में लझी रही यूपी की राजनीति इन दिनों ब्राह्म्णों के इर्दगिर्द घूम रही है। विधानसभा चुनावों से पहले यूपी की सत्ता पर कब्जा जमाने को आतुर दलों में राम-परशुराम को लेकर गलाकाट स्पर्धा शुरु हो गयी है।
     
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तीन दशकों से मंडल बनाम कमंडल की जंग में लझी रही यूपी की राजनीति इन दिनों ब्राह्म्णों के इर्दगिर्द घूम रही है। विधानसभा चुनावों से पहले यूपी की सत्ता पर कब्जा जमाने को आतुर दलों में राम-परशुराम को लेकर गलाकाट स्पर्धा शुरु हो गयी है।


उत्तर प्रदेश में मिशन 2022 को लेकर रणभेरी बज चुकी है और सियासी दल राम और परशुराम में उलझ चुके हैं। राम और रहीम की सियासत वाले उत्तर प्रदेश में परशुराम अचानक अहम हो गए हैं और भगवान परशुराम को लेकर  सियासी दलों में होड़ सी मच गयी है। इन सियासी दलों द्वारा जिस ढंग से राम और परशुराम को लेकर पेशबंदी की जा रही है उससे लगता है कि आने वाले समय में राम यानी धर्म और परशुराम यानी जाति फिर से महत्वपूर्ण होने जा रही है।





जिस राम नगरी अयोध्या को केंद्र बना व रामरथ पर सवार हो सत्ता का सुख भोग रही भाजपा को उसी रामनगरी अयोध्या में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले  बसपा महासचिव द्वारा रामनगरी अयोध्या से राम और परशुराम को लेकर माहौल बनाया गया।  अयोध्या में राममंदिर के भूमि पूजन के बीच में ही समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण कार्ड खेला है। पार्टी द्वारा प्रदेश के सभी 75 जिलों में भगवान परशुराम की प्रतिमा लगाए जाने की बात कही गयी है।


सपा मुखिया अखिलेश यादव ने एसपी की प्रबुद्ध सभा और परशुराम पीठ से जुड़े पार्टी के नेताओं को ब्राह्मण समुदाय के बीच में बैठकें करने के लिए कहा है। सपा का कहना है कि लगातार उत्पीड़न झेल रहे ब्राह्मण समुदाय के लोगों में योगी सरकार के प्रति नाराज़गी है। उन्होंने कहा कि इन बैठकों के दौरान लोगों को बताया जाएगा कि ब्राह्मणों को न्याय सिर्फ़ अखिलेश यादव की सरकार में ही मिल सकता है।





उधर कांग्रेस में रहे और "ब्राह्मण चेतना मंच" बैनर तले ब्राह्मण एकता का नारा देने वाले जितिन प्रसाद को भाजपा ने पार्टी में शामिल करा लिया है और अब उनको एमएलसी बनाये जाने की भी चर्चा है। भाजपा बड़े पैमाने पर ब्राह्म्ण समाज को खुश करने में जुटी है। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में यूपी से इस समुदाय के अजय मिश्रा को जगह मिली तो प्रदेश संगठन में कई पदों पर ब्राह्म्णों की ताजपोशी की गयी। चर्चा तो यहां तक है कि आने वाले दिनों में यूपी में भी मंत्रिपरिषद का विस्तार कुछ ब्राह्म्णों को जगह दी जाएगी।    




  
दरअसल कानपुर में विकास दुबे और उनके साथियों की एनकाउंटर में मौत और उसके बाद ग़ाज़ीपुर के राकेश पांडेय की पुलिस मुठभेड़ में मौत के अलावा ब्राह्मण समुदाय के लोगों की हो रही हत्याओं ने आम लोगों में योगी सरकार के प्रति रोष उत्पन्न कर दिया था। साथ ही उनके इस गुस्से की अभिव्यक्ति सोशल मीडिया पर देखी जा रही थी। सूबे की सियासत में फिलहाल ब्राह्मण और भगवान परशुराम राजनीति का केंद्र बन गये हैं। विकास दुबे एनकाउंटर के बाद भाजपा को ब्राह्मण विरोधी बताया जा रहा है। इसी विरोध को कैश कराने को लेकर सपा के दो प्रमुख नेता इस मिशन में काफी आगे जा चुके हैं तो बसपा प्रमुख मायावती ने शुक्रवार को 'प्रबुद्ध वर्ग विचार संगोष्ठी' करके ब्राह्मण राजनीति को और हवा दे दी है। 


 
 फिलहाल इस सियासत की दिशा-दशा चुनाव आने तक क्या होगी यह तो वक्त बताएगा लेकिन ब्राह्मणों को अपना बनाने की कवायद में लगे विपक्ष ने भाजपा की चिंता जरूर बढ़ा दिया है।  भाजपा को परंपरागत मतदाता रहे ब्राह्मण की कथित नाराजगी को दूर करने की चिंता है, तो समाजवादी पार्टी को उनकी इस नाराजगी को कैश कराने की है.। ऐसे में बहुजन समाज पार्टी का ब्राह्मण राजनीति को लेकर यह मुहिम आने वाले समय में ब्राह्मण सियासत को और हवा दे रहा है।



कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा की योगी सरकार के अगले कुछ दिनों में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में ब्राह्मण चेहरों को शामिल कर उन को रिझाने का प्रयास जरूर करेगी। उधर कांग्रेस में रहे और "ब्राह्मण चेतना मंच" बैनर तले ब्राह्मण एकता का नारा देने वाले जितिन प्रसाद भी भाजपाई हो चुके हैं और उनको एमएलसी बनाया जा सकता है। समाजवादी पार्टी भी इस मुहीम में पीछे नहीं रहेगी और वह विकास दुबे एनकाउंटर, खुशी दुबे की रिहाई तथा योगी सरकार में हुए ब्राह्मणों की हत्या को मुद्दा बनाकर इस बुद्धिजीवी वर्ग को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।




इन सबसे अलग कांग्रेस अपनी ओर से भी इसी तरह के प्रयास कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि यूपी को सबसे ज्यादा और आखिरी ब्रह्म्ण मुख्यमंत्री इसी ने दिया था। पार्टी का मानना है कि अकेला वही एक एसा राजनैतिक दल है जिसके सत्ता में आने पर ब्राह्म्ण मुख्यमंत्री बन सकता है। पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों में किसी ब्राह्म्ण चेहरे को आगे कर मुख्यमंत्री पद के लिए प्रस्तावित कर औरों से आगे निकल सकती है। हाल के दिनों में कांग्रेस में संगठन में हुयी नियुक्तियों को देंखें तो यह संभव भी लगता है।  






इन तीनों प्रमुख दलों ने अपने अपने प्रमुख ब्राम्हण चेहरों को इस कवायद में आगे कर दिया है। भाजपा संगठन की तरफ से संगठन के ब्राह्मण प्रवक्ताओं के अलावा सरकार की तरफ से दिनेश शर्मा, बृजेश पाठक, श्रीकांत शर्मा जैसे नेता आगे किए जा चुके हैं। तो समाजवादी पार्टी की तरफ से कैबिनेट मंत्री रहे मनोज पांडे, अभिषेक मिश्रा और विधायक रहे संतोष पांडे इस मुहिम में लग चुके हैं। वहीं बसपा ने ब्राह्मणों को रिझाने की यह जिम्मेदारी पार्टी के महासचिव सतीश मिश्रा को सौंपी है और उनके साथ बसपा सरकार में मंत्री रहे दो प्रमुख ब्राम्हण चेहरे अनंत मिश्रा उर्फ अंतू मिश्रा व नकुल दुबे मोर्चा संभाल चुके हैं।  



बसपा महासचिव सतीश मिश्रा का कहना है कि यदि 13 फीसदी ब्राम्हण और करीब 23 फीसदी दलित मत एक हो जाएगा तो उनकी सरकार को सत्ता में आने से कोई रोक नहीं पायेगा। भाजपा की भी चिंता इन्हीं मतों को सहेजे रखने की है साथ ही सपा करीब इतने ही प्रतिशत मतवाले गैर यादव पिछड़े मतों को जोड़ने के लिए जोड़-तोड़ जैसे प्रयासों को मूर्त रूप देने में लगी है।


बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों को अगर आप देखें तो इसमें सतीश मिश्रा सिर्फ़ दलित-ब्राह्मण भाईचारे की बात करते हैं। वे कहते हैं कि 23 फ़ीसदी दलित और 13 फ़ीसदी ब्राह्मण साथ आ जाएं तो उत्तर प्रदेश में फिर से बीएसपी की सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता। मायावती ख़ुद इन ब्राह्मण सम्मेलनों की मॉनीटरिंग कर रही हैं।



24 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को बड़ी सियासी ताक़त माना जाता रहा है। बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों के बाद बीजेपी के नेताओं ने जोर-शोर से कहना शुरू किया है कि ब्राह्मण समुदाय फिर से मायावती के साथ नहीं जाएगा। इससे उसकी घबराहट का पता चलता है।



हांलांकि सियासत के जानकारों का मानना है कि इससे बसपा को कोई बहुत बड़ा लाभ नहीं होने वाला है और 2007 के बाद बसपा का अचानक उपजा यह ब्राह्मण प्रेम सवालों के घेरे में है। जबकि दूसरी तरफ प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुकी है. उनका कहना है कि आने वाले समय में सियासी मुद्दा राम और परशुराम ही होने जा रहे हैं। जहां भाजपा धार्मिक नगरी काशी और अयोध्या के विकास को पेश कर विकास के साथ धर्म का तडका पेश करेगी तो सपा परशुराम को आगे कर अपने चुनाव अभियान की शुरुआत मथुरा नगरी से कर सकती है।








हो सकता है ओबीसी आरक्षण का खेला :-

जैसे जैसे यूपी के विधानसभा के चुनाव करीब आ रहे हैं, जातीय गोलबंदी और भी बढ़ती जाएगी, सौ फीसद तय है। फिलहाल हवा में ब्राहमण कार्ड का शोर है लेकिन दावेदार दलों के सभी आला नेताओं को मालूम है कि सत्ता की कुंजी पिछड़ो के पास है।वास्तव में कुलीन समाज उत्तर प्रदेश के 2017 के विधानसभा चुनावों को भले ही मोदी मैजिक का असर बताते हुए कहता हो कि मोदी के कारण जाति बंधन टूटे मगर राजनीतिक पंडितों के हिसाब से इस जीत का कारण गैर यादव ओबीसी मतों का संग्रहण था जिसने भाजपा के वोट प्रतिशत को अचानक 14 प्रतिशत की उछाल दे दी थी। भाजपा की इस जीत में राजभर, कुर्मी, निषाद और मौर्या समाज के वोटों की बड़ी भूमिका रही। ब्राह्मण वर्ग पहले के मुकाबले इस बार ज्यादा मुखर होकर भाजपा के साथ आया था।



यूपी में जातीय हिस्सेदारी का नारा नया नहीं है। साथ के दशक में डा. लोहिया के नारे ‘पिछड़ा पाए सौ में साठ’ के नारे को 90 के दशक में काँसीराम ने “जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी” के जरिए इतना आगे बढ़ दिया कि मायावती चार बार मुख्यमंत्री बन गईं।






इस बार भाजपा के सामने अपने पिछले समीकरण को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। राजभर गठबंधन से बाहर है और कुर्मी भी एकसाथ नहीं दिखाई दे रहा। इस बीच सूबे की सियासत में निषाद एक बड़े वोट ब्लाक के रूप में उभर रहा है। फिलहाल निषाद समाज के बीच बड़ा नेता बनने की होड़ लगी है।दलित और ओबीसी राजनीति करने वाले हर दल के सामने आरक्षण हमेशा एक बड़ा सवाल रहता है। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र है जहां  मराठा आरक्षण खत्म करने के कोर्ट के फैसले ने राजनीति के समंदर में लहरों को ऊंचा उछाल दियाहै।



चर्चा है कि संसद के वर्तमान सत्र में मोदी सरकार एक ऐसा बिल लाने की तैयारी में है जिसके जरिए वो एक तीर से कई शिकार करेगी। ये बिल पिछड़ो के आरक्षण की मांग को और मजबूती देगा जिसके जरिए यूपी जैसे बड़े राज्य में भाजपा ओबीसी वोटों के बिखराव को रोकने में कामयाब होगी।



दरअसल मोदी सरकार संविधान के 102 वें संशोधन को बदलने का बिल लाने वाली है, जिसके जरिए हर राज्य अपने अनुसार ओबीसी वर्ग को चिन्हित कर सकेगा। इसके लिए सामाजिक न्याय मंत्रालय ने एक कैबिनेट नोट भी तैयार कर लिया है। इस नोट के अनुसार बनने वाले बिल में यह प्रावधान होगा कि राज्य अपने क्षेत्र में किसी जाति को पिछड़ा वर्ग के अंदर ले सकता है।5 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार दे दिया था और उसके बाद ही राज्यों द्वारा पिछड़े वर्ग के निर्धारण की शक्तियां भी खत्म हो गई थी। यानि पिछड़े वर्ग में किसी जाति को लेने का फैसला केंद्र और राज्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के पास सुरक्षित हो गया था।





यह व्यवस्था भी मोदी सरकार ने ही 2018 में की थी। और संविधान के 102वे संशोधन के जरिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया गया जिसपर राष्ट्रपति ने संसद की मंजूरी के बाद इस संविधान संशोधन पर हस्ताक्षर कर दिए।लेकिन इस फैसले के बाद सरकारों के सामने एक राजनीतिक मुश्किल भी खड़ी हो गई। उसके हाँथ से आरक्षण देने की शक्ति निकल  गई।





मानसून सत्र में इस बिल को लाने से मोदी सरकार को दो बड़े फायदे होने हैं। पहला इस बिल के पास हो जाने के बाद यूपी की भाजपा सरकार अपने समीकरणों के अनुसार कुछ जातियों को पिछड़े आरक्षण का लाभ दे कर अपने सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी को चित्त कर सकती है और दूसरी तरफ राजभर और निषाद सरीखे वोटों पर जातीय नेताओं का वर्चस्व खत्म कर उन्हे अपने अंदर समेट सकती है।और दूसरा फायदा यह होगा कि फिलहाल पेगासस जासूसी कांड, किसान आंदोलन और कोरोना की असफलता  सहित कई मुद्दे पीछे चले जाएंगे, चुनावी बिसात पर जातीय समीकरण एक बार फिर भारी पड़ेंगे।



यह सच है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने अचानक लिए फैसलों से हमेशा विपक्ष को मात देते रहे हैं। यदि वे एक बार फिर ऐसा करे तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे भी 5 अगस्त का दिन करीब आ रहा है और बीते कई सालों से यह दिन मोदी के बड़े राजनीतिक दांव लगाने वाले दिन के रूप में पहचान जा रहा है।



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